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मटर की खेती: अच्छी उपज के लिए इन बातों का ध्यान रखना है ज़रूरी

नई दिल्ली: मटर की खेती दोमट व हल्की दोमट मिट्टी में करने से बेहतर पैदावार प्राप्त होती है। इसकी खेती से पहले अच्छी तरह से खेत की तैयारी काफी आवश्यक है। इसके लिए प्रथम जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2-3 जुताइयां देसी हल या कल्टीवेटर से करनी चाहिए।

मटर की कुछ उन्नत किस्में रचना, इन्द्र, शिखा, मालवीय मटर 2, पूसा प्रभात, पन्त मटर 5 और प्रकाश इत्यादि हैं। लेकिन बेहतर होगा कि आप क्षेत्रीय अनुकूलता के अनुसार मटर की प्रजातियों का चयन कर प्रमाणित बीज का प्रयोग करें। जहाँ तक बात है बीज की मात्रा की तो यह 80-100 किलोग्राम/हेक्टर लम्बे पौधे की प्रजातियों के लिए तथा बौनी प्रजातियों के लिए 125 किग्रा० प्रति हेक्टर है। मटर की बुआई अक्टूबर के मध्य से नवम्बर के मध्य तक बौनी प्रजातियों के लिए हल के पीछे 20 सेमी० की दूरी पर करनी चाहिए। जबकि लंबी प्रजातियों को 30 सेमी० की दूरी पर बोना चाहिए।

किसान मित्रों, बीज जनित रोग से बचाव के लिए आप थीरम 2 ग्राम या मैकोंजेब 3 ग्राम या फिर 4 ग्राम ट्राइकोडरमा का इस्तेमाल बीजों को बोने से पहले कर सकते हैं। जाड़े में वर्षा न हो तो फूल आने के समय एक सिंचाई ज़रूर करें। जबकि दाना भरते समय दूसरी सिंचाई लाभप्रद होती है। बथुआ, सेन्जी, कृष्णनील, हिरनखुरी, जंगली गाजर व प्याजी इत्यादि मटर की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख खरपतवार हैं। इनपर नियंत्रण के लिए आप फ्लूक्लोरैलीन 45 प्रतिशत ई.सी. का इस्तेमाल कर सकते हैं।

किसान मित्रों, पूरी तरह से पकने के बाद ही फसल कटाई करनी चाहिए। कटाई के बाद साफ-सुथरे खलिहान में इसकी मड़ाई करके मटर के दाने निकालें। इसके बाद इसके उचित भण्डारण व कीटों से बचाव के लिए जैविक या रसायनिक उपायों को अपना सकते हैं।

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