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अच्छी पैदावार के लिए मक्के की खेती के दौरान इन उपायों को अपनाएँ

नई दिल्ली: मक्का एक बहुपयोगी फसल है। यह विश्व के अनेक देशों में उगाई जाती है। इसका इस्तेमाल अनाज के अलावा हरा चारा, पोल्ट्री उद्योग, इथेनॉल और बेबी कॉर्न के रूप में होता है। इसकी खेती से किसानों को अच्छी आमदनी प्राप्त होती है। यह एक ऐसी फसल है जिसे रबी, खरीफ और बसंत तीनों ही मौसमों में उगाया जाता है। जिन क्षेत्रों में जल का स्तर नीचे गिर रहा है वहाँ के लिए मक्के की खेती एक बेहतर विकल्प है।

अगर आप इस फसल से अधिक पैदावार लेना चाहते हैं तो कुछ उपायों को अपनाकर इसमें सफलता पा सकते हैं। मसलन, मक्के की बेहतर पैदावार के लिए जुलाई के अंत तक हर हाल में फसल की बुआई पूरी कर लें। बुआई शुरू करने से पहले खेत तैयार करते समय 12 से 15 सेंटीमीटर तक गहरी जुताई करें। ताकि मिट्टी की सतह पर मौजूद जीवाश्म और पत्तियां मिट्टी में अच्छी तरह से मिल जाएँ। इसके बाद मिट्टी के नीचे हरी खाद या कम्पोस्ट दबा दें। फिर 4-5 बार जुताई कर मिट्टी को अच्छी तरह से भुरभुरा बना लें।

मक्के की अच्छी पैदावार के लिए एक एकड़ खेत में 7 से 8 किलोग्राम संकर बीज डालना पर्याप्त होता है। इसलिए अच्छी उपज के लिए बीजों की उचित मात्रा का ध्यान रखें। मिट्टी और बीजजनित रोगों से फसल के बचाव के लिए बीज का उपचार जरूर कर लें। इसके बाद उनकी बुआई मेड़ या कतार में करें। इस दौरान कतार से कतार की दूरी 75 सेंटीमीटर जबकि पौधे से पौधे की दूरी 20 सेंटीमीटर बनाए रखें।

मक्के की बुआई के बाद जैसे ही खेत में पाव जमने लगे एट्राजिन का छिड़काव करें। इससे खेत में खर-पतवार का प्रभाव नहीं बढ़ पाता है। बुआई के बाद खेत की हल्की सिंचाई जरूर करें। इससे पौधों का अच्छे से विकास होता है। हल्की सिंचाई की प्रक्रिया को बार-बार तब तक दोहारते रहें करते रहें जब तक उनकी ऊँचाई घुटनों के बराबर न हो जाए।

औसत उपजाऊ भूमि में मक्के की संकर किस्मों के लिए प्रति एकड़ 60 किलोग्राम नाइट्रोजन, 25 किलोग्राम फास्फोरस और 25 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। खेत में फास्फोरस और पोटाश को एक ही बार डाल दें जबकि नाइट्रोजन को तीन बार बराबर भाग में बांटकर कर इस्तेमाल करें। बुआई के दौरान ही 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट भी दिया जा सकता है। इससे भी पैदावार में बढ़ोतरी होती है।

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