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अधिक उत्पादन लेने के लिए जीरे की फसल को इन रोगों से बचाएँ

नई दिल्ली: मसाला फसलों में जीरे का एक महत्वपूर्ण स्थान है। इसका पौधा दिखने में सौंफ की तरह होता है। यदि इसकी उन्नत तरीके से खेती की जाए तो बढ़िया पैदावार प्राप्त कर इससे अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। जीरा वार्षिक फसल वाला एक हर्बेशियस पौधा है। इसके तने में कई शाखाएं होती हैं तथा पौधे की औसत ऊंचाई लगभग 20-30 सेमी तक होती है। इसकी प्रत्येक शाखा की 2-3 उपशाखाएं होती हैं व सभी शाखाएं समान ऊंचाई लेती हैं। जीरा उत्पादन के मामले में गुजरात और राजस्थान अव्वल हैं। यहाँ देश का लगभग 80 प्रतिशत से अधिक जीरा उगाया जाता है। राजस्थान में देश के कुल उत्पादन का लगभग 28 प्रतिशत जीरे का उत्पादन किया जाता है।

यदि आप भी जीरे की खेती शुरू करना चाहते हैं तो आपको इस फसल की उत्पादकता पर प्रभाव डालने वाले कुछ प्रमुख कारकों के बारे में ज़रूर जानना चाहिए। जी हाँ, कई अन्य फसलों की तरह जीरे की फसल में भी खरपतवार की समस्या अक्सर देखने को मिलती है। इस समस्या से निजात पाने के लिए जीरे की बुआई से पहले खेत से खरपतवार को अच्छी तरह से ज़रूर निकालें। इसके बाद जीरे की बुआई के समय 500 लीटर पानी में पेंडीमेथिलीन को घोलकर फसल पर छिड़काव करें।

जीरे की फसल में उकठा या विल्ट रोग का अक्सर आक्रमण होता है। यह रोग फ्यूजेरियम नामक मृदाजनित एवं बीजजनित कवक के कारण होता है, जो जीरे की जड़ों पर हमला कर पौधे को नष्ट कर देता है। यह रोग पौधे की किसी भी अवस्था में आक्रमण कर सकता है। लेकिन जब पौधे छोटे ही होते हैं, तब इस रोग का प्रकोप अधिक देखने को मिलता है। इस रोग के लक्षण सबसे पहले पत्तियों पर देखे जाते हैं। इसके कारण जीरे की पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं और पौधा मुरझा जाता है।

जीरे की फसल को उकठा रोग से बचाने के लिए गर्मी के मौसम में खेत की गहरी जुताई करें ताकि हानिकारक रोगाणु नष्ट किए जा सकें। जिस खेत में उकठा रोग का एक बार संक्रमण हो चुका है उस खेत में अगले 3 वर्षों तक जीरे खेती नहीं करनी चाहिए। खेत में उकठा रोग के लक्षण दिखाई देने पर एक किलोग्राम जैविक फफूंदनाशी ट्राइकोडर्मा विरिड को एक एकड़ खेत में 100 किलोग्राम गोबर की खाद में मिलाकर खेत में फैला दें। फिर इसके तुरन्त बाद खेत की हल्की सिंचाई करें। ऐसा करने से भी उकठा रोग के प्रभाव में कमी आती है।

जीरे की फसल पर समय-समय पर झुलसा रोग का भी प्रकोप देखने को मिलता है। यह रोग अल्टरनेरिया बोन्रिसी कवक के द्वारा होता है। इस रोग से प्रभावित होने पर जीरे के पौधों पर भूरे व काले धब्बे बन जाते हैं, जो बाद में गहरे काले रंग के हो जाते हैं। फसल में फूल आने की अवस्था में अगर धूप नहीं निकलती है तो इस रोग का प्रकोप और भी बढ़ जाता है। इस रोग से ग्रसित होने पर जीरे की पैदावार कम हो जाती है।

जीरे की फसल को झुलसा रोग से बचाने के लिए मेन्कोजेब 2 प्रतिशत का निर्देशानुसार छिड़काव करें। अगर इसके बाद भी रोग के प्रभाव में कमी नहीं आए तो 15 दिनों के बाद फिर से इस रसायन का छिड़कव करें। ऐसा करने से झुलसा रोग के प्रकोप में कमी आने लगेगी।

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