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बेल की खेती से अधिक व गुणवत्तापूर्ण पैदावार प्राप्त करने के लिए इन बातों का रखें ध्यान

नई दिल्ली: बेल की खेती की अपनी कई विशेषताएँ हैं। मसलन, इसकी खेती से आप प्रति ईकाई उच्च उत्पादकता प्राप्त कर सकते हैं। यह काफी मात्रा में पोषण और कई औषधीय गुणों से भरपूर होता है। साथ ही इसका भण्डारण भी काफी अधिक समय तक किया जा सकता है। इसलिए इसकी बिक्री के लिए किसान को काफी समय मिलता है।

वैसे तो बेल को किसी भी प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है। लेकिन, बलूई दोमट मिट्टी वाली भूमि जहाँ बेहतर तरीके से जल की निकासी हो सके, इसकी खेती के लिये उपयुक्त होती है। बेल की खेती के लिए 6 से 8 पी एच मान वाली भूमि अधिक बेहतर मानी जाती है। हालाँकि, ऊसर, बंजर, कंकरीली, खादर एवं बीहड भूमि में भी बेल के पौधे लगाए जा सकते हैं।

किसान मित्रों, जैसा कि आप जानते ही हैं किसी भी फसल की पैदावार उसकी बीज की गुणवत्ता पर काफी हद तक निर्भर करती है। इसलिए ज़रूरी है कि आप बेल के उन्नत किस्मों का चयन करें। कुछ समय पहले तक बेल के कुछ पुराने क़िस्मों जैसे – सिवान, देवरिया बडा, कागजी इटावा, चकिया, मिर्जापुरी, कागजी गोण्डा आदि को ज़रूर अपनाया जाता रहा है। लेकिन अब इनके बजाय कुछ प्रमुख उन्नत किस्में चलन में हैं। जैसे- नरेन्द्र बेल- 5, नरेन्द्र बेल- 7, नरेन्द्र बेल- 9, पंत सिवानी, पंत अर्पणा, पंत उर्वशी, पंत सुजाता, गोमा यशी, सी आई एस एच बी- 1 और सी आई एस एच बी- 2 इत्यादि।

किसान मित्रों, बेल की उन्नत खेती के लिए अगर आप बीज की रोपाई 5 से 8 मीटर की दूरी पर मृदा उर्वरता तथा पौधे की बढ़वार के अनुसार करेंगे तो बेहतर होगा। जुलाई से अगस्त महीने तक का समय बेल की रोपाई के लिए अच्छा माना जाता है। इसलिए यह ज़रूरी है कि आप अप्रैल से मई माह तक 5 से 8 मीटर के अन्तर पर 1 x 1 x 1 मीटर के गड्ढे तैयार कर लें। यदि जमीन में कंकड की तह हो तो उसे निकाल दें। फिर इन गड्ढों को 20 से 30 दिनों तक खुला छोड दें। इसके बाद 3 से 4 टोकरी गोबर की सड़ी हुई खाद गड्ढे की ऊपरी आधी मिट्टी में मिला दें। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होगी।

पौधों की अच्छी बढवार एवं पेड़ों को स्वस्थ रखने के लिये विभिन्न पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। इसलिए प्रत्येक पौधे में 5 किलोग्राम गोबर की सड़ी हुई खाद, 50 ग्राम नत्रजन, 25 ग्राम फास्फोरस व 50 ग्राम पोटास की मात्रा प्रति वर्ष डालनी चाहिए। खेत में खाद एवं उर्वरक की यह मात्रा अगले दस वर्षों तक डालनी चाहिए।

बेल के नये पौधों को स्थापित करने के लिए एक दो वर्ष तक सिंचाई ज़रूरी होती है। स्थापित पौधे बिना सिंचाई के भी अच्छी तरह से रह सकते हैं। गर्मी के मौसम में बेल का पौधा अपनी पत्तियाँ गिरा देता है। इससे पौधे में सूखे को सहन कर लेने की क्षमता आती है। किसान मित्रों, उपरोक्त बातों का ध्यान रखते हुए आप बेल की खेती से अधिक व गुणवत्तापूर्ण पैदावार प्राप्त कर सकते हैं।

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