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दलहनी फसलों की उपज बढ़ाने के लिए अपनाएँ ये उपाय

नई दिल्ली: भारतीय कृषि में दलहनी फसलों का एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। इनमें चना, मूंग, मोठ, उड़द, अरहर व सोयाबीन इत्यादि शामिल हैं। दलहनी वर्ग की इन सभी फसलों में प्रोटीन की काफी मात्रा मौजूद होती है। इस वजह से इनके उचित विकास के लिए इन्हें नाइट्रोजन की काफी जरूरत पड़ती है, जिसकी पूर्ति वायुमंडल में मौजूद नाइट्रोजन से हो जाती है। दलहनी पौधों की जड़ों की ग्रंथिकाओं में राइजोबियम नाम का एक जीवाणु पाया जाता है, जो वायुमंडलीय नत्रजन का स्थिरीकरण कर फसल की पैदावर बढ़ाने में सहायक होता है। राइजोबियम दलहनी फसलों में प्रयोग होने वाला एक जैव उवर्रक है।

राइजोबियम कल्चर के जरिये दलहनी फसलों की उत्पादकता में काफी वृद्धि होती है। इसका प्रयोग बीज का उपचार करने में तथा फसल की बुआई के पहले गोबर खाद के साथ मिलाकर किया जाता है। बीजों के उपचार के लिए आप 600 ग्राम राइजोबियिम के तीन पैकेट को प्रति हेक्टेयर के दर से प्रयोग कर सकते हैं। इसके लिए 1 लीटर पानी में 60 ग्राम गुड़ डालकर गरम कर लें फिर घोल बनाएँ। इस घोल के ठंडा होने पर इसमें 3 पैकेट राइजोबियिम कल्चर मिलाएँ और इसे धीरे-धीरे मिलाते रहें। इतना घोल 1 हेक्टेयर भूमि में बोए जाने वाले बीजों के उपचार लिए पर्याप्त होता है। इस घोल को बीजों पर धीरे-धीरे इस तरह छिड़कना चाहिए कि घोल की परत सब बीजों पर समान रूप से चिपक जाए। इसके बाद इन बीजों को किसी छायादार स्थान पर सुखाएं और फिर उनकी बुआई करें। जबकि मृदा उपचार के लिए बुआई के पहले प्रति हेक्टेयर में 2 किलो ग्राम राइजोबियिम कल्चर के 10 पैकेट का इस्तेमाल करें। इसमें 25 किलोग्राम गोबर की खाद तथा 25 किलोग्राम मिट्टी भी मिलाएँ।

राइजोबियम कल्चर के कई प्रमुख लाभ हैं। मसलन ये जीवाणु वातावरण की स्वतंत्र नाइट्रोजन को पौधों तक पहुंचाते हैं। जीवाणुओं के द्वारा यौगिकीकृत नाइट्रोजन कार्बनिक रूप में होने के कारण इसका क्षय कम होता है, जबकि नाइट्रोजन वाले उर्वरकों का एक बड़ा हिस्सा तमाम कारणों से इस्तेमाल नहीं हो पाता है। जबकि यह राइजोबियम जीवाणुओं द्वारा पौधों को मिल जाता है। इसके अलावा दलहनी फसलों की जड़ों में मौजूद जीवाणुओं द्वारा जमा की गई नाइट्रोजन अगली फसल में भी इस्तेमाल हो जाती है। राइजोबियम कल्चर के इस्तेमाल से चना, अरहर, मूंग व उड़द की उपज में 20-30 प्रतिशत व सोयाबीन की उपज में 50-60 प्रतिशत तक का इजाफा होता है। यही नहीं, जीवाणु खाद के इस्तेमाल से दलहनी फसलें हर साल मिट्टी में नाइट्रोजन जमा करती हैं, इससे उर्वरक पर होने वाले खर्चे में काफी कमी आती है।

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