कृषि पिटारा

टिकाऊ खेती की नींव हैं देसी बीज, हाइब्रिड बीजों से कई मामले में हैं बेहतर

नई दिल्ली: भारत में परंपरागत कृषि की जड़ें काफी पुरानी हैं। किसान लंबे समय से गोबर, गौमूत्र और नीम से लेकर देसी बीजों का इस्तेमाल करते आ रहे हैं, जो परंपरागत खेती की एक अहम भूमिका निभाते हैं। लेकिन विज्ञान की तरक्की के साथ-साथ किसान खेती में कृत्रिम विधियों का इस्तेमाल करने लगे। बदलते समय के साथ गोबर-गौमूत्र और देसी बीजों के स्थान पर आजकल रासायनिक उर्वरकों और हाइब्रिड बीजों का इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, हाइब्रिड बीजों का इस्तेमाल करने से पैदावार में वृद्धि हो सकती है, लेकिन देसी बीजों को टिकाऊ खेती की नींव माना जाता है। जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों के चलते विशेषज्ञ आज भी देसी बीजों का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार देसी बीज या ओपन पोलिनेटेड बीज खुद को जलवायु के अनुसार ढाल लेते हैं और इससे फसलों की गुणवत्ता बढ़ती रहती है। ये बीज पूरी तरह से प्राकृतिक रूप से डिजाइन होते हैं और उन्हें पैदावार के दौरान बचाकर रखा जाता है। देसी बीजों में कुछ कीटनाशकों और कीट-पतंगों के प्रति कम प्रतिरोधक क्षमता होती है, लेकिन उनमें स्वाद और पौधों के विकास की खासियत होती है।

हाइब्रिड बीज या संकर बीज वैज्ञानिकों के द्वारा डिजाइन किए जाते हैं और इनमें दो वैरायटी के गुणों का योग होता है। हाइब्रिड बीज के मुकाबले ये बीज पैदावार में ज्यादा मजबूत और अधिक पैदावार देने वाले हैं, लेकिन इन्हें खरीदने में भी खर्च काफी ज्यादा होता है। हाइब्रिड बीजों में कीट व रोगों के प्रति अधिक प्रतिरोधी क्षमता होती है, जिससे फसलों की सुरक्षा मिलती है, लेकिन इनमें स्वाद और क्वालिटी कम हो सकती है। कृषि विज्ञानियों का मानना है कि देसी बीज टिकाऊ खेती के लिए महत्वपूर्ण हैं, जो किसानों को पैदावार की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद करते हैं।

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