कृषि पिटारा

किसान बंजर भूमि में भी कर सकते हैं इस फसल की खेती

लखनऊ: भारतीय कृषि क्षेत्र में किसान अब नई-नई तकनीकों का इस्तेमाल करके ज्यादा मुनाफा कमा रहे हैं। इस दिशा में मडुआ की खेती उनके लिए एक बेहतरीन विकल्प साबित हो रही है। मडुआ, जिसे रागी भी कहा जाता है, इस समय बाजार में इसकी काफी अच्छी कीमत मिल रही है। इसकी खेती काफी सस्ती और आसान होती है। यह फसल न केवल स्वादिष्ट होती है, बल्कि बहुत पौष्टिक भी होती है, यह प्रोटीन का अच्छा स्रोत है और इससे कम लागत में अधिक उत्पादन होता है।

एक वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक के अनुसार मडुआ की फसल रागी से भिन्न होती है और इसको फिंगर मिलेट्स के नाम से भी जाना जाता है। इसकी खेती बंजर भूमि और बहुत कम खर्चे में होती है। इससे किसानों को बेहतर मुनाफा प्राप्त होता है। उन्होंने बताया कि सोनभद्र और मिर्जापुर जिले में मडुआ की खेती बड़े पैमाने पर की जा रही है। मडुआ की खेती उच्च, निचली या बंजर भूमि पर की जा सकती है और लगभग 3 महीने में यह फसल तैयार हो जाती है। इसकी 4.5-8 पीएच वाली मृदा में सबसे अच्छी उपज दर्ज की गई है।

मडुआ प्राकृतिक रूप से उगता है और तैयार होता है और किसानों को इस पर बहुत ज्यादा खर्च करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इसकी उच्च पोषण की मान्यता है और यह सूखे की स्थिति का सामना करने में सक्षम है। वह इसे पूरे वर्ष आसानी से उगा सकते हैं। मडुआ की फसल में किसी प्रकार के उर्वरक के प्रयोग की जरूरत नहीं होती है और न ही अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है। यह फसल ज्वार, बाजरा, रागी, कंगनी, कोदो, कुटकी व  चना आदि के साथ मोटे अनाजों की सूची में शामिल है, जो अपने पोषण गुणों और सीमित व्यवस्थाओं में अधिक पैदावार देने के लिए जाना जाता है। ऐसे में, जिन किसानों के सामने भूमि की उर्वरता तथा सूखे की समस्या है या जो ऐसी भूमि में अधिक कृषि लागत वहाँ नहीं कर सकते – उनके लिए मडुआ की खेती एक बहुत ही शानदार विकल्प है।

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