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इन औषधीय पौधों की खेती में है बढ़िया मुनाफा

भारत सरकार ने नवंबर 2000 में राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (एनएमपीबी) की स्थापना की थी। एनएमपीबी औषधीय पौधों, समर्थन नीतियों और व्यापार, निर्यात, संरक्षण व खेती के विकास से संबंधित सभी कार्यक्रमों का संचालन करता है। इसके जरिये आपको आयुर्वेदिक चिकित्सा, अनुसंधान, औषधीय पौधों की खेती पर आने वाली लागत और फसल की देखभाल आदि के बारे में जानकारी मिलती है। अगर आप एनएमपीबी की वेबसाइट पर जाएँ तो यहाँ पर आपके लिए औषधीय पौधों की खेती के लिए वित्तीय सहायता से संबंधित केंद्रीय योजनाओं के बारे में भी जानकारी उपलब्ध है।

आपको बता दें कि भारत में औषधीय पौधे से बनी दवाओं का लगभग 8 हजार करोड़ रुपए का बाजार है। वर्तमान में लगभग 80 प्रतिशत औषधीय पौधे प्राकृतिक स्त्रोतों से प्राप्त किये जाते हैं। जबकि जंगलों के कट जाने और बढ़ती हुई मांग के कारण प्राकृतिक स्त्रोतों से औषधीय पौधों की मांग को पूरा करना अब काफी मुश्किल हो गया है। ऐसे में, अगर आप औषधीय पौधों की खेती करते हैं तो आपको इसमें अच्छा मुनाफा होगा। इसके लिए आपके पास इन औषधीय पौधों की खेती के विकल्प मौजूद हैं:

स्टीविया की खेती:

स्टीविया की खेती में आपको अच्छा मुनाफा प्राप्त होगा। स्टीविया कई औषधीय गुणों से भरपूर एक बहुपयोगी पौधा है। यह मधुमेह रोगियों के लिए काफी लाभदायक माना जाता है। इसकी बढ़ती माँग को देखकर भारत के कई राज्यों जैसे मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और झारखंड में अच्छी मात्रा में इसकी खेती हो रही है।

स्टीविया की खेती के लिए अर्द्ध आर्द्र और अर्द्ध उष्ण जलवायु उपयुक्त होती है। जलवायु के लिहाज से जिन क्षेत्रों में तापमान शून्य डिग्री से नीचे जाता है उनको छोड़ कर भारत में स्टेविया की खेती पूरे साल में कभी भी की जा सकती है।

लेमन ग्रास की खेती:

लेमन ग्रास की पत्तियों का उपयोग लेमन टी बनाने में तो होता ही है। इसके अलावा इससे निकलने वाले तेल से कई प्रकार के सौदर्य प्रसाधन बनाए जाते हैं। भारत में CIMAP के जरिए इसकी खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके जरिये किसानों को प्रशिक्षण से लेकर तेल निकालने और मार्केटिंग तक की जानकारी दी जाती है।

लेमन ग्रास की खेती के लिए पहाड़ी क्षेत्र उपयुक्त माना जाता है। उदाहरण के तौर पर राजस्थान के बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ में लैमन ग्रास का पौधा साल भर में तीन बार उपज देता है। लेमन ग्रास की एक खासियत ये है कि प्रत्येक कटाई के बाद इसकी सिंचाई करने से उत्पादन में बढ़ोतरी होती है। अगर आप लेमन ग्रास की खेती करना चाहते है तो अप्रैल से मई महीने तक इसकी नर्सरी ज़रूर तैयार कर लें।

शतावर की खेती:

शतावर का उपयोग कई रोगों के इलाज़ के लिए किया जाता है। शतावर की खेती के लिए 10 से 50 डिग्री सेल्सियस तापमान बेहतर माना जाता है। अगर आप शतावर की खेती करना चाहते हैं तो जुलाई से अगस्त महीने के दौरान खेत की 2 से 3 बार अच्छी तरह से जुताई कर लें और अंतिम जुताई के समय 10 टन सड़ी हुई गोबर की खाद् प्रति एकड़ के हिसाब से खेत में मिला दें। फिर 10 मीटर की क्यारी बना कर बीजो की बुआई करें। शतावर की बुआई के लिए प्रति एकड़ 5 किलो बीज की आवश्यकता होती है। शतावर के बीज आपको उद्यानिकी विभाग, CIMAP या फिर निजी दुकानों पर आसानी से मिल जाएंगे। अगर बात करें आमदनी की तो इस समय बाजार में शतावर की जड़ों की कीमत कम से कम 250 से 300 प्रति किलो तक है।

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