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इस स्थिति में कम हो जाती है पपीते की पैदावार

नई दिल्ली: अगर आप पपीते की खेती कर रहे हैं तो आपको इसमें लगने वाले एक प्रमुख रोग के प्रति बहुत सावधान रहने की आवश्यकता है। पपीते के पौधों में अक्सर कुबड़ापन की समस्या देखने को मिलती है। इसका प्रमुख कारण है बोरॅान की कमी होना। बोरॉन की कमी के शुरुआती लक्षणों में से एक है – परिपक्व पत्तियों का हल्का पीला होना। कुछ समय बाद पपीते की पत्तियाँ नीचे की ओर मुड़ने लगती हैं। इसके अलावा एक मुख्य तने के ऊपरी हिस्से से एक सफेद लेटेक्स का स्राव भी होने लगता है।

बोरॅान की कमी के कारण पपीते के फल अपनी सही शक्ल नहीं ले पाते हैं, जिसके कारण वो कुबड़ापन लिए हुए विकसित होते हैं और अंत में नष्ट हो जाते हैं। किसी भी फलदार पौधों में बोरॉन की कमी का सबसे पहला संकेत फूलों का गिरना है। जब फल विकसित होते हैं, तो वे एक सफेद लेटेक्स का स्राव करने की संभावना रखते हैं। इस दौरान बोरॉन की कमी के कारण पपीते के फल विकृत और ढेलेदार हो जाते हैं।

बोरॉन की कमी की भरपाई करने के लिए आप मिट्टी का परीक्षण करके बोरॉन की मात्रा का उचित निर्धारण कर सकते हैं। अगर किसी कारणवश आप मृदा परीक्षण करने में असमर्थ हैं तो आप प्रति पौधा 8 से 10 ग्राम बेसल डोज मिट्टी में दें। यह काम आप भूमि की जुताई करते समय भी कर सकते हैं। इसके अलावा आप प्रति लीटर पानी में बोरॉन की 6 ग्राम मात्रा को घोलकर एक एक महीने के अंतर पर 8 महीनों तक छिड़काव कर सकते हैं। इससे भी फल में बनने वाले कुबड़ापन को खत्म किया जा सकता है।

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