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जानिए, गन्ने की इन विशेष किस्मों की क्या है खासियत?

नई दिल्ली: भारत गन्ने का एक प्रमुख उत्पादक देश है। गन्ना भारत की महत्वपूर्ण वाणिज्यिक फसलों में से एक है। नकदी फसल के रूप में इसका एक प्रमुख स्थान है। हमारे देश में चीनी उत्पादन का मुख्य स्रोत गन्ना है। भारत दुनिया में चीनी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। यहाँ गन्ने की खेती लोगों को बड़ी संख्या में रोजगार देती है। गन्ना खेती को हमारे देश में पांच जोन में बांटा गया है। ये हैं – नॉर्थ वेस्ट जोन, नॉर्थ सेंट्रल जोन, नॉर्थ ईस्टर्न जोन, पेनिनसुलर जोन और कोस्टल जोन। इन सभी जोन में गन्ने की सबसे अधिक पैदावार अर्द्ध उष्णसकटिबंधीय क्षेत्रों में होती है। हमारे देश में गन्नेक की खेती का 55 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और पंजाब से आता है। जबकि बाकी हिस्सा महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, गोवा और पुडुचेरी से आता है।

किसी भी फसल की खेती में उसकी उन्नत किस्मों की एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जी हाँ, काफी हद तक अच्छी या औसत पैदावार बीज की किस्मों पर निर्भर करती है। ऐसे में गन्ने की फसल से अच्छी पैदावार प्राप्त करने की चाह रखने वाले किसानों के लिए एक अच्छी खबर है। दरअसल, गन्ना शोध संस्थान शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश के वैज्ञानिकों ने गन्ने की तीन नई किस्में विकसित की हैं। इन किस्मों को विकसित करने में 10 साल तक शोध किया गया है। इन किस्मों के बारे में वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे गन्ना किसानों और शुगर मिलों को एक बहुत बड़ी राहत मिलेगी। गन्ना शोध संस्थान शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश की ओर से यह कहा गया है कि जिन गन्ने की तीन नई किस्मों की खोज की गई है उनमे खास बात यह है कि ये रोगमुक्त हैं। साथ ही ये चीनी की रिकॉर्ड तोड़ रिकवरी देंगी। इन्हें हर तरह की मिट्टी में उगाया जा सकता है। इन किस्मों के नाम हैं – कोसा 13235, कोसा 13452 और कोसा 10239

कोसा 13452 एक मध्यम देर से पकने वाली किस्म है। इसकी पैदावार 86 से 95 टन प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है। इसमें व्यावसायिक शर्करा उपज 12.08 पाया गया है। जबकि कोसा 13235 के बारे में वैज्ञानिकों का मानना है कि यह किसानों के लिए वरदान साबित हो सकती है। क्योंकि बाकी गन्नों की तुलना में यह शीघ्र पकने वाली किस्म है। इसकी उपज 81 से 92 टन प्रति हेक्टेयर तक अनुमानित है। इसमें व्यावसायिक शर्करा 11.55 पाया गया है। इसकी फसल 10 माह में पककर तैयार हो जाती है। संस्थान द्वारा विकसित तीसरी किस्म कोसा 10239 है। यह एक मध्यम देर से पकने वाली किस्म है। जल भराव की स्थिति में इसकी पैदावार 63 से 79 टन प्रति हेक्टेयर हो सकती है। जबकि ऊसर या बंजर जमीन पर इसकी पैदावार 61 से 70 टन बताई जा रही है।

आपको बता दें कि उपरोक्त तीनों ही किस्में कीट और रोगों के प्रकोप से मुक्त हैं। इस वजह से इनकी खेती करने पर इस बात की पूरी संभावना है कि अन्य किस्मों की तुलना में इनसे आपको अधिक व गुणवत्तापूर्ण पैदावार प्राप्त होगी।

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