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खाद की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार के पास क्या विकल्प हैं?

नई दिल्ली: आने वाले रबी सीजन में खाद की मांग व इसकी समुचित मात्रा में आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री मनसुख मांडविया ने एक अहम बैठक की है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इस बैठक में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाद की बढ़ती कीमतों को लेकर भी चर्चा हुई है। खाद की बढ़ती कीमतें इस समय सरकार के लिए एक बड़ी मुसीबत बनी हुई हैं। क्योंकि आगामी अक्टूबर महीने से रबी सीजन की शुरुआत होते ही खाद की मांग में एक बड़ा उछाल देखने को मिलेगा। ऐसे में, सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी मांग के अनुरूप निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना।

खाद की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार के पास फिलहाल दो ही विकल्प नजर आ रहे हैं। या तो कंपनियों को दाम बढ़ाने की इजाजत दी जाए या फिर सब्सिडी बढ़ाने की व्यवस्था की जाए। अब चूँकि आने वाले साल में दो प्रमुख कृषि प्रधान राज्यों उत्तर प्रदेश व पंजाब में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में खाद की कीमतें बढ़ाना सरकार के हक़ में नहीं होगा। इस बात को सरकार भी भली भाँति समझ रही है। इस परिस्थिति में सरकार के पास एक ही विकल्प बचता है, जिसे वह खाद की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए लागू कर सकती है। वह है – खाद पर मिलने वाले सब्सिडी में बढ़ोतरी।

गौरतलब है कि कोरोना महामारी के इस दौर में खाड़ी देशों ने डीएपी खाद के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमतें काफी बढ़ा दी हैं। इसकी वजह से इस समय डीएपी खाद की एक बोरी की कीमत लगभग दोगुनी हो गई है। लिहाजा, किसानों को राहत देते हुए केंद्र सरकार ने सब्सिडी में 140 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी का फैसला किया था। खरीफ सीजन के लिए केंद्र सरकार ने डीएपी खाद के लिए सब्सिडी 500 रुपये से बढ़ाकर 1200 प्रति बैग कर दिया था। डीएपी की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि के बाद किसानों को प्रति बैग 1200 रुपये ही खाद के चुकाने होते हैं। हाल ही में डीएपी में इस्तेमाल होने वाले फॉस्फोरिक एसिड, अमोनिया आदि की अंतरराष्ट्रीय कीमतें 60 प्रतिशत से 70 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं। इसी कारण एक डीएपी बैग की वास्तविक कीमत इस समय 2400 रुपये है।

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