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तोरई की खेती: कुछ छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखकर आप बढ़ा सकते हैं पैदावार

नई दिल्ली: तोरई लतर की तरह फैलने वाली एक सब्जी है। इसकी खेती पूरे भारत में की जाती है। लेकिन तोरई के मुख्य उत्पादक राज्य केरल, उड़ीसा, कर्नाटक, बंगाल बिहार और उत्तर प्रदेश हैं। अगर आप तोरई की व्यावसायिक खेती करना चाहते हैं तो आपको बता दें कि इसकी खेती गर्म और आर्द्र जलवायु में बढ़िया उपज देती है। यानी तोरई की खेती के लिए 32-38 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान अच्छा माना जाता है। इसकी खेती लगभग सभी प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती है। वैसे अच्छी उपज के लिए बलुई दोमट या दोमट मिटटी ज्यादा उपयुक्त मानी जाती है। हाँ, भूमि का चुनाव करते समय इतना ज़रूर ध्यान रखें कि भूमि पर पानी न ठहरता हो तथा मिट्टी जीवांशयुक्त हो।

तोरई की फसल लगाने के लिए खेत की तैयारी करते समय खेत में लगभग 20-25 टन सड़ी गोबर की खाद मिलाएँ। साथ ही नत्रजन, फास्फोरस और पोटाश भी आवश्यकता अनुसार प्रति हेक्टेयर की दर से मिलाएँ। जहाँ तक बात है तोरई की कुछ उन्नत किस्मों की तो ये हैं – पूसा चिकनी, पूसा स्नेहा, पूसा सुप्रिया, काशी दिव्या और कल्याणपुर चिकनी इत्यादि। किसान मित्रों बेहतर होगा कि इनमें से किसी भी किस्म का चुनाव आप अपने क्षेत्र विशेष की भौगोलिक दशा को ध्यान में रखकर करें। 

आप ग्रीष्मकालीन तोरई की बुवाई मार्च में कर सकते हैं। अगर आप तोरई की वर्षाकालीन फसल बोना चाहते हैं तो इसकी बुआई जून से लेकर जुलाई तक कर सकते हैं। तोरई की बुआई के लिए आप 1 हेक्टेयर क्षेत्रफल में 3-5 किलोग्राम बीज का प्रयोग करें। बताते चलें कि अगर आप बीज की बुआई नाली विधि से करेंगे तो आपको अच्छी पैदावार प्राप्त होगी। किसान मित्रों, बीज की बुआई के बाद ग्रीष्मकालीन फसल की अच्छी उपज काफी हद तक अच्छी सिंचाई पर निर्भर करती है। इसलिए गर्मी के दिनों में फसल की लगभग 5-6 दिनों के अन्तराल पर सिंचाई जरूर करें। अगर आपने वर्षाकालीन फसल लगाई है, तो इसमें सिंचाई की जरूरत नहीं है। हाँ, अगर समय पर बारिश नहीं हुई है, तो आप खेत में नमी बनाए रखने के लिए सिंचाई ज़रूर कर सकते हैं। 

तोरई की तुड़ाई मुलायम अवस्था में कर लेनी चाहिए। क्योंकि अगर इसकी तुड़ाई में देरी होती है, तो फलों में कड़े रेशे बन जाते हैं। इसलिए फलों की तुड़ाई 6-7 दिनों के अन्तराल पर ज़रूर करें। इस तरह आप एक सीजन में तोरई की लगभग 7 से 8 बार तुड़ाई कर सकते हैं। तुड़ाई के बाद तोरई को ताजा बनाए रखने के लिए ठण्डे छायादार स्थान का चुनाव करें और बीच-बीच में उन पर पानी का भी छिड़काव करते रहें। जहाँ तक पैदावार की बात है तो इसकी अच्छी उपज उन्नत किस्म और फसल की देखभाल पर निर्भर करती है। लेकिन अगर आप वैज्ञानिक तरीके से तोरई की खेती करेंगे तो आपको प्रति हेक्टेयर लगभग 200-400 क्विंटल उपज आसानी से मिल सकती है।

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