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क्या है काले गेहूँ की सच्चाई? विस्तार से जानिए

नई दिल्ली: आलू, टमाटर व चावल के बाद अब काला गेहूँ भी आ गया है। जी हाँ, काला गेहूँ से आज के समय में एक ओर जहाँ कुछ प्रगतिशील किसान परिचित हैं तो वहीं दूसरी ओर कुछ किसान इसका नाम सुनते ही इसे नकार देते हैं। तो आखिर काले गेहूँ की सच्चाई क्या है? क्या वाकई में ऐसी कोई चीज होती है या यह महज एक अफवाह है? चलिये पता करने की कोशिश करते हैं।

ऐसा बताया जा रहा है कि काला गेहूँ भारत में पहली बार आया है और यह कई औषधीय गुणों से भरपूर है। पिछले वर्ष नवंबर में नेशनल एग्री फूड बायोटेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट,मोहाली (नाबी) ने सात साल के लंबे रिसर्च के बाद काले गेहूँ का पेटेंट कराया था। नाबी ने गेहूँ की इस किस्म को ‘नाबी एमजी’ नाम दिया था। पंजाब और हरियाणा में काले गेहूँ की खेती करने वाले किसान बताते हैं कि शुरू में इसकी बालियां भी आम गेहूँ जैसी हरी होती हैं। लेकिन पकने के बाद इसके दानों का रंग काला हो जाता है।

काला गेहूँ किसानों के बीच अपने रंग की वजह से जिज्ञासा का विषय बना हुआ है। ऐसे में जाहिर है कि आप भी इस गेहूँ के कालेपन की वजह जानना चाहेंगे। किसान मित्रों,फलों, सब्जियों और अनाजों के रंग उनमें मौजूद प्लांट पिगमेंट या रंजक कणों की मात्रा पर निर्भर करते हैं। काले गेहूँ में एंथोसाएनिन नाम के पिगमेंट होते हैं। एंथोसाएनिन की अधिकता से फलों, सब्जियों व अनाजों का रंग नीला, बैंगनी या काला हो जाता है। आपको बता दें कि आम गेहूँ में एंथोसाएनिन केवल पांच पीपीएम होता है, लेकिन काले गेहूँ में यह 100 से 200 पीपीएम के आसपास होता है। एंथोसाएनिन के अलावा काले गेहूँ में जिंक और आयरन की मात्रा में भी अंतर होता है। काले गेहूँ में आम गेहूँ की तुलना में 60 प्रतिशत अधिक आयरन होता है। हालांकि इसमें प्रोटीन, स्टार्च और दूसरे पोषक तत्व समान मात्रा में मौजूद होते हैं।

काले गेहूँ के बारे में ऐसा दावा किया जा रहा है कि इसके आटे के सेवन से न केवल तनाव, मोटापा, डायबिटीज व हृद्य रोग से बल्कि कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी में भी लाभ होता है। आपको बता दें कि, फिलहाल काले गेहूँ की कीमत काफी ऊँची है। जी हाँ, फिलहाल यह 2 से लेकर 4 हजार रुपये प्रति किलो के भाव में बिक रहा है। इस वजह से काफी किसान आज के समय में काले गेहूँ की खेती में रुचि दिखा रहे हैं।

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