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नींबू की खेती को प्रभावित करने वाले ये हैं प्रमुख रोग व कीट

नई दिल्ली: नींबू वर्गीय फलों के उत्पादन के मामले में हमारा देश विश्व भर में तीसरे स्थान पर आता है। नींबू वर्गीय फलों में विटामिन सी की अधिकता पायी जाती है। नींबू स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभकारी होता है। बाज़ार में इसकी मांग लगभग पूरे साल बनी रहती है। इसलिए इसकी व्यवसायिक से किसानों को काफी लाभ प्राप्त होता है, लेकिन यदि समय रहते कुछ सावधानियाँ न अपनाई जाएँ तो कई ऐसे रोग व कीट हैं जो नींबू की खेती को घाटे का सौदा बना सकते हैं। नींबू की खेती को निम्न रोगों व कीटों से आक्रांत होने का खतरा हमेशा बना रहता है, इसलिए बेहतर होगा कि आप समय रहते इनको नियंत्रित करने का प्रयास करें:

नींबू का तेला: नींबू जाति के पौधों को नींबू का तेला रस चूसकर हानि पहुंचाता है। मुख्य रूप से मार्च-अप्रैल तथा वर्षा ऋतु के बाद
नींबू की लीफ माइनर : पत्तियों की दोनों सतहों पर चांदी की तरह चमकीली और टेढ़ी-मेढ़ी सुरंग बनाती है।

रोकथाम: तेला व लीफ माइनर के नियंत्रण हेतु अप्रैल में 750 मि.ली. मैटासिस्टाक्स 25 ईसी या 625 मिली रोगोर 30 ईसी या 500 मिली मोनोक्रोटोफास 36 एसएल को 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ बाग में छिड़कें।

नींबू का कैंकर रोगः बरसात के दिनों में यह रोग जीवाणु के द्वारा फैलता है। इस रोग के लक्षण नींबू की पत्तियों, शाखाओं,फलों व डण्ठल पर दिखाई देता है। नींबू की पत्तियों पर यह रोग शुरू में पीले धब्बें के रूप में प्रकट होते है जो बढते हुए कठोर भूरे रंग के उभरे हुए छालों में बदल जाते है।

रोकथाम: इससे बचाव के लिए रोग ग्रस्त शाखाओं को काटकर जला देना चाहिए।
इसके अलावा कटे हुए शाखाओं पर बोर्डों पेस्ट का लेप लगाने से भी रोग के विस्तार को रोका जा सकता है।
अगर आप रासायनिक विधि से इस रोग का उपचार करना चाहते हैं तो स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट और ट्रेट्रासाइक्लिन हाइड्रोक्लाराइड (90:10) 1 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करें।

नींबू का धीमा उखरा रोगः यह रोग पौधों में सूत्रकृमि के कारण होता है। इस रोग के कारण जड़ की छाल जड़ों से अलग हो जाती है। पत्तियां पीली एवं छोटी हो जाती है और फल छोटे आकार के हो जाते हैं।

रोकथाम: इसपर नियंत्रण के लिए नीम की खली 1 किलो ग्राम प्रति पौधा या 100 किलो ग्राम प्रति एकड़ मिट्टी में मिलाऐं या थालों में कार्बोप्यूरान 4 जी का प्रयोग करें।

नींबू का आर्द्र गलन रोगः यह एक कवक से फैलने वाला रोग है। यह बीमारी नर्सरी में पौधों को नुकसान पहुँचाती है। इसके कारण पौधे मिट्टी के सतह के पास से गलकर गिरने लगते हैं और मर जाते हैं।

रोकथाम: इस रोग पर नियंत्रण के लिए रासायनिक कवकनाशी कैप्टान 0.2 प्रतिशत प्रतिलीटर पानी को फाइटोलॉन 0.2 प्रतिशत या पेरिनॉक्स 0.5 प्रतिशत के साथ मिलाकर नर्सरी में छिड़काव करें।

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