कृषि पिटारा

दलहनी फसलों को बदलते मौसम में हैं इन रोगों से ख़तरा, किसान अपनाएँ ये उपाय

नई दिल्ली: बदलते मौसम का प्रभाव अब दलहनी फसलों पर भी दिखने लगा है। यह स्थिति किसानों को चुनौती देने का आभास करा रहा है। इन फसलों में चना, मसूर, राजमा, अरहर, मूंग, उड़द, चीनी मटर और गेहूँ शामिल हैं, जो प्रोटीन के मुख्य स्रोत हैं और लगभग सभी घरों में उपयोग में लाई जाती हैं। फिलहाल देशभर में लगभग 260 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में दलहनी फसलों की खेती की जा रही है, जिसका वार्षिक उत्पादन लगभग 140 लाख टन है। खाद्य सुरक्षा में इन फसलों की महत्वपूर्ण भूमिका है, क्योंकि संतुलित आहार में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 80 ग्राम दाल की आवश्यकता है।

हालांकि, इन फसलों की खेती में बदलते मौसम के कारण किसानों को कई समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। तापमान के उतार-चढ़ाव के कारण इन फसलों पर कई रोगों का खतरा बढ़ रहा है। मसलन – इन दिनों दलहनी फसलों में स्टेमफिलियम ब्लाईट रोग एक महत्वपूर्ण चुनौती बन चुका है, जिससे चना, मसूर, मूंग और अन्य फसलें प्रभावित हो रही हैं। इस रोग के कारण दलहनी फसलों की पत्तियों पर छोटे व काले धब्बे बनते हैं और पौधों को नुकसान होता है, जिससे पूर्ण फसल की उत्पादकता भारी कमी में हो सकती है।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, दलहनी फसलों की बुआई से पहले उनका उपचार और सही बीजों का चयन करने से किसान इस चुनौती का सामना कर सकते हैं। कई कृषि विज्ञान केन्द्रों के जरिये उन्हें सिखाया जा रहा है कि बीजों को कैसे प्रोसेस करें ताकि वे रोग प्रतिरोधी बनें और फसल को बचाने में मदद करें। इसके अलावा, उन्हें बुआई के समय प्रोटीन की कमी की समस्या को सुलझाने के लिए समझाया जा रहा है ताकि उनकी फसलें स्वस्थ और प्रोटीन-युक्त हों।

किसानों को यह सुनिश्चित करने के लिए सलाह दी जा रही है कि वे उपयुक्त और प्रोटीन से भरपूर बीजों का चयन करें और उपचारों का सही ढंग से अनुसरण करें ताकि उनकी फसलें सुरक्षित रहें और उन्हें अधिक लाभ हो। इस समय, जब तापमान के उतार-चढ़ाव और बदलते मौसम के चलते किसानों को अपनी फसलों की सुरक्षा के लिए और अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है, उन्हें नए तकनीकी उपायों को भी सीखना आवश्यक है।

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