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तोरई की उपज को ये रोग व कीट कर देते हैं कम, ऐसे करें इनपर नियंत्रण

नई दिल्ली: तोरई की खेती लगभग देश के सभी राज्यों होती है। यह बेल वाली एक कद्दूवर्गीय सब्जी है। इसे बड़े खेतों के अलावा छोटी क्यारियों में भी उगाया जा सकता है। तोरई की खेती जायद और खरीफ दोनों ऋतुओं में की जा सकती है। किसान मित्रों, गर्मियों के दिनों में बाजार में इसकी काफी मांग होती है, इसलिए कम पूँजी लगने के कारण इसकी खेती बहुत लाभदायक है। तोरई की खेती गर्म और आर्द्र दोनों ही जलवायु में की जाती है। 32-38 डिग्री सेंटीग्रेड का तापमान इसकी खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है। अगर आप तोरई की खेती करना चाहते हैं तो बेहतर होगा कि आप इसकी खेती मार्च में ज़रूर शुरू कर दें। तोरई की खेती लगभग सभी तरह की मिट्टी में हो सकती है। लेकिन फसल की अच्छी उपज के लिए बलुई दोमट या दोमट मिट्टी बेहतर होती है।

किसान मित्रों, तोरई की फसल में पत्तों के ऊपरी भाग पर धब्बा रोग अक्सर देखने को मिलता है। इस रोग के कारण पत्तों की ऊपरी सतह पर सफेद रंग के धब्बे नज़र आते हैं, जिसके कारण पत्ते नष्ट हो जाते हैं। इस रोग पर नियंत्रण के लिए गर्म और नमी वाले मौसम में उपचार करना जरूरी है। इस रोग से बचाव के लिए एम 45, 2 ग्राम को 1 लीटर पानी में मिलाकर डालें। इस रोग को क्लोरोथालोनिल, बिनोमाइल या डिनोकैप की स्प्रे से भी नियंत्रित किया जा सकता है।

तोरई की फसल पर भुंडि नाम के कीट का भी हमला होता है। यह कीट फूल, पत्ते और तना को नष्ट कर देता हैं। इससे बचाव के लिए अपने निकतम कृषि विभाग द्वारा सुझाए गए कीटनाशी का इस्तेमाल करें।

किसान मित्रों, चेपा और थ्रिप्स कीट तोरई के पत्तों का रस चूसते हैं, जिससे पत्ते पीले होकर गिरने लगते हैं। थ्रिप्स का हमला होने से पत्ते मुड़ जाते हैं और कप के आकर में आ जाते हैं या ऊपर की तरफ से मुड़ जाते हैं। यदि इनका हमला खेत में दिखे तो थाइमैथोक्सम 5 ग्राम को 15 लीटर पानी में मिलाकर फसल पर छिड़काव करें।

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