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ये दलहनी फसल हरी खाद के लिए हैं सर्वाधिक उपयुक्त

नई दिल्ली: रसायनिक खेती के दुष्प्रभावों की वजह से आजकल इसके विकल्पों को अपनाने पर ज़्यादा ज़ोर दिया जा रहा है। हरी खाद एक ऐसा ही विकल्प है जिसके फायदे बहुत अधिक और नुकसान न के बराबर हैं। इससे मिट्टी की संरचना में बहुत सुधार होता है। गोबर की खाद और अन्य कम्पोस्ट की कम आपूर्ति की वजह से आज हरी खाद का महत्व और भी बढ़ गया है। इसकी वजह से फसल तेजी से वृद्धि करती है और विपरीत परिस्थतियों में उगने की क्षमता रखती है। हरी खाद उगाने में बहुत कम खर्च आता है। यह इसका एक बहुत ही सकारात्मक पहलू है।

क्षेत्र के अनुसार हरी खाद वाली का दलहनी फसल का चुनाव बहुत ही आवश्यक है। हरी खाद के लिए दलहनी फसलों में सनई, ढैंचा, लोबिया, उड़द, मूंग और ग्वार आदि फसलों का उपयोग किया जाता है। क्योंकि इन फसलों की वृद्धि काफी तेजी से होती है। इन फसलों की पत्तियां बहुत वजनदार होती हैं और इनकी संख्या भी बहुत अधिक होती है। इन फसलों को उगाने में उर्वरक और पानी की बहुत कम आवश्यकता पड़ती है। दलहनी फसलों की जड़ों में गांठे होती है, जिनमें मौजूद बैक्टीरिया वायुमंडल से नाइट्रोजन इकट्ठा कर मृदा में इसकी उपस्थिति को बढ़ाते हैं।

जिन क्षेत्रों में अधिक वर्षा होती है, हरी खाद के लिए वहाँ सनई की खेती लाभप्रद होगी। इसके लिए 32-36 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से बीज का इस्तेमाल करें। जबकि कम बारिश वाले इलाकों व समस्याग्रस्त भूमि में आप ढैंचे की खेती कर सकते हैं। क्षारीय इलाकों में भी हरी खाद के तौर पर ढैंचे की बुआई की जा सकती है। ढैंचा की हरी खाद फसल के लिए 25 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से बीज की जरूरत होती है। इसके अलावा ग्वार की बुआई कम वर्षा वाले, रेतीली मिट्टी वाले और कम उपजाऊ इलाकों में की जा सकती है। साथ ही लोबिया को अच्छे जल निकास वाली क्षारीय मिट्टी में हरी खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसी तरह मूंग और उड़द को खरीफ या गर्मी के मौसम में उपयोग किया जा सकता है।

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