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ये रोग कर सकते हैं मूँगफली की पैदावार में भारी कमी, ऐसे करें इनसे बचाव

नई दिल्ली: तिलहनी फसलों की खेती में मूँगफली का एक प्रमुख स्थान है। इसमें विटामिन बी, विटामिन-सी, कैल्शियम, मैग्नेशियम, जिंक फॉस्फोरस व पोटाश आदि खनिज तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो मानव शरीर को स्वस्थ रखने के लिए बहुत ही आवश्यक हैं। बाज़ार में पूरे साल मूँगफली का भाव ऊँचा रहता है। इसलिए इसकी खेती करने वाले किसानों को यह फसल काफी अच्छा मुनाफा देती है। लेकिन तमाम फसलों की तरह मूँगफली की फसल को भी विभिन्न रोगों से आक्रांत रहने का खतरा बना रहता है। ये रोग इस प्रकार है:

टिक्का रोग: भारत में मूँगफली का यह एक मुख्य रोग है और मूँगफली की खेती वाले सभी क्षेत्रों में पाया जाता है। इस रोग के दौरान पत्तियों के ऊपर बहुत अधिक धब्बे बन जाते हैं। इस वजह से पत्तियाँ पकने से पहले ही गिर जाती हैं, जिससे पौधों से फलियां बहुत कम और छोटी प्राप्त होती हैं।

इससे बचाव के लिए मूँगफली के पुराने संक्रमित अवशेषों को मिट्टी में दबा दें। उर्वरक एनपीके और जिप्सम का प्रयोग करें, इसके उपयोग से रोग के प्रभाव में कमी आती है। इस रोग के प्रभाव के दौरान कैप्टान कवकनाशी रसायन से मूँगफली के पौधों को उपचारित करना काफी फायदेमंद साबित होता है। यदि रोग के प्रभाव में कमी नहीं आए तो कार्बेन्डाजिम रसायन की 200 ग्राम मात्रा को प्रति 100 लीटर पानी में मिलाकर 15-15 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें।

गेरुई रोग: मूँगफली के गेरुई रोग के कारण उत्पादन में लगभग 14-32 प्रतिशत तक की कमी आ जाती है। इस रोग के लक्षण सबसे पहले पत्तियों की निचली सतह पर धब्बों के रुप में दिखाई पड़ते हैं। इस रोग के कारण मूँगफली की पैदावार में कमी आ जाती है। साथ ही बीजों में तेल की मात्रा भी घट जाती है।

इस रोग की रोकथाम के लिए रोगरहित प्रजातियों की बुआई करें। मूँगफली के बीज को कवकनाशी थिरम या कैप्टान से उपचारित करें। इसके अलावा गेरुई रोग के प्रकोप में कमी नहीं आने पर फसल पर बाविस्टीन का निर्देशनुसार छिड़काव करें।

जड़ सडऩ रोग: यह रोग मृदा में पाई जाने वाली फफूंदी से फैलता है। इस रोग से प्रभावित होने पर पौधों की जड़ों में व भूमि के सतह के नजदीक सफेद धागे के आकार की रचनायें बन जाती हैं। इस रोग का विस्तार काफी तेजी से होता है और अंततः मूँगफली की पत्तियां भूरे रंग की होकर गिर जाती हैं।

जड़ सड़न रोग पर नियंत्रण के लिए मई-जून के महीनों में खेत की गहरी जुताई करें तथा बीजों की बुआई से पहले उनका शोधन अवश्य करें। लम्बी अवधि वाले फसल चक्र को अपनाएँ। इसके अलावा रोग से प्रभावित पौधों को इकठ्ठा करके जला दें। उपरोक्त उपायों को अपनाकर आप मूँगफली की फसल को रोगमुक्त रख सकते हैं। इससे आपको बढ़िया पैदावार प्राप्त करने व अधिक मुनाफा कमाने की संभावना बढ़ जाएगी।

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